mindfulness meaning in hindi | सचेतन अवस्था

वर्तमान क्षण से अपनी चेतना को जोड़ना ही सचेतन है, जो भविष्य और अतीत  दोनों से दूर रखता है। मन में उठने वाले हर विचार के बारे में जानने से पहले उसकी जांच करनी जरूरी है। अपने आसपास के घटनाक्रम से विचलित ना होना। उस पर सहज प्रतिक्रिया देना ही माइंडफूलनेस है। माइंडफुलनेस हमारे और हमारे आस-पास की दुनिया की पल-पल की जागरूकता है। इसका अर्थ यह है कि आप अपने और आपके आसपास क्या हो रहा है, इस पर ध्यान दे रहे हैं और उनसे सचेत हैं।

 

contents:- 

1- Mindfulness meaning  |  सचेतन अवस्था का अर्थ

2- सफलता के लिए सचेतनता की आवश्यकता | mindfulness for success

3- सचेतन अवस्था द्वारा कठिन परिश्रम से सफलता का वरण करना | mindfulness for hard working

4- सभी मनुष्य एक जैसे होते हुए भी सांसारिक जीवन में सब अलग अलग क्यों हैं? 

5- मन की इच्छाओं को सचेतनता द्वारा चरम लक्ष्य तक पहुंचाना 

6- जीवन में खोजी प्रवृत्ति का होना आवश्यक है 

7- सफलता की सच्चाई जानना | Knowing the Truth of Success

 

mindfulness meditation meaning in Hindi

by Hem Joshi

mindfulness meaning in hindi

इस पोस्ट में हम सचेतन अवस्था के बारे में संपूर्ण जानकारी देंगे। Mindfulness meaning in Hindi में विस्तार से हिंदी में सचेतन अवस्था की चर्चा होगी। हमें आशा है आप हमारी जानकारी से संतुष्ट होंगे। सचेतन अवस्था से संबंधित आपके सभी प्रश्नों के उत्तर हम देने की कोशिश करेंगे।

Mindfulness meaning  |  सचेतन अवस्था का अर्थ

वर्तमान क्षण से अपनी चेतना को जोड़ना ही सचेतन है, जो भविष्य और अतीत  दोनों से दूर रखता है। मन में उठने वाले हर विचार के बारे में जानने से पहले उसकी जांच करनी जरूरी है। अपने आसपास के घटनाक्रम से विचलित ना होना। उस पर सहज प्रतिक्रिया देना ही माइंडफूलनेस है। माइंडफुलनेस हमारे और हमारे आस-पास की दुनिया की पल-पल की जागरूकता है। इसका अर्थ यह है कि आप अपने और आपके आसपास क्या हो रहा है, इस पर ध्यान दे रहे हैं और उनसे सचेत हैं।

विचारों की स्वीकार्यता जरुरी है।

सरल अर्थ में माइंडफूलनेस का मतलब, मन में आने वाले विचारों और भावनाओं से विचलित हुए बिना सहज प्रतिक्रिया देना है ।

सफलता के लिए सचेतनता की आवश्यकता | mindfulness for success

  • इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति जीवन में सफलता का एक सुनहरा अवसर संजोए रहता है। उसमें से कोई सफल होता है तो कोई असफल। सफल होने के लिए मन का एकाग्र होना बहुत आवश्यक है। बाहर से देखने से तो  सफलता केवल तुक्का लगती है। अगर उसकी गहराई को देखें तो परिश्रम की पराकाष्ठा दिखाई देती है।
  • हमें जो काम करना है, उसे तन्मयता से करने के लिए मन का नियंत्रण बहुत जरूरी है। मन हमें बाहरी दुनिया में भटकाए रखता है। मन इंसान को हमेशा धोखे में रखता है। मन की इन चालों से बचने के लिए सचेतन अवस्था बहुत जरूरी है।
  • सफल होने वालों के संदर्भ में कभी ऐसी परिस्थितियां भी देखने को मिलती हैं, जिनके कारण अल्प योग्यता वाले साधनों से भी  व्यक्ति बड़े-बड़े लाभ प्राप्त कर लेते हैं।
  • किसी के सामने अनायास ही कोई ऐसा अवसर आ जाता है, जिसमें मानो सफलता ने स्वयं ही उसका वरण कर लिया हो। इसके अतिरिक्त सफलता के मूल में पक्षपात और भाई भतीजावाद  जैसी स्थितियां भी दिखाई देती हैं। 

सचेतन अवस्था द्वारा कठिन परिश्रम से सफलता का वरण करना | mindfulness for hard working

  • जोर जबरदस्ती के हाथों में सफलता को बिकता हुआ देखा जा रहा है। इन सबसे हटकर एक और स्थिति है जिसमें मनुष्य अपने प्रयत्न और प्रबल प्रसार से अवरोधों और कठिनाइयों से जूझ कर परिस्थितियों को चीरता हुआ सफलता के उच्च शिखर पर पहुंच जाता है। इन तीनों में सफलता के प्रथम दो कारण ऐसे हैं जिनमें वसाद तो है पर श्रेष्ठ साधन नहीं है।
  • वास्तव में सफलता के लिए यदि कोई इष्टतम साधन हो सकता है तो वह है व्यक्ति का जुझारूपन ,उसकी कर्मठता, सीखने की इच्छा। अब प्रश्न यह है कि व्यक्ति में यह जुझारूपन आए कहां से? क्या अनायास ही आ जाता है? नहीं। इसके पीछे व्यक्ति का सूक्ष्म व्यक्तित्व की क्रियाशीलता होती है। उसके अंदर की उमंग उसे उछालती है। उसकी बुद्धि उसे परामर्श देती है। इन दोनों के समन्वय से कुछ कर गुजरने का मन बन जाता है। 
  • प्रथम चरण में इच्छा आकांक्षा प्रकट होती है। वह भी ऐसी कि सफलता की ओर कदम बढ़ाए बिना चैन कहां? हम देखते हैं कि एक ही कक्षा में एक ही अध्यापक द्वारा पढ़ाई हुए छात्रों की उपलब्धियों में भारी अंतर होता है। कोई प्रवीण सूची में स्थान पाता है। किसी को पास होने के लाले पड़े रहते हैं और कोई फेल होता है। कोई कुशाग्र बन जाता है। किसी की बुद्धि एक कदम आगे नहीं खिसकती।
  • हमने सगे भाई बहनों में भी जमीन आसमान की भिन्नता के उदाहरण देखे होंगे। समाज में किसी को धनकुबेर तो किसी को रोटियों के मोहताज देख रहे हैं। कोई अद्भुत विद्वान है तो कोई निरक्षर। किसी के चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती है, तो कोई आंसू पीते पीते जिंदगी का भार ढोता है। एक निरंतर उल्लास और आनंद की ओर बढ़ रहा है, तो दूसरे का जीवन अंधकार और अवसाद में डूबा जा रहा है। एक दुख भोग रहा है तो दूसरा चैन की बंसी बजा रहा है। आखिर इस अंतर के पीछे राज क्या है?

सभी मनुष्य एक जैसे होते हुए भी सांसारिक जीवन में सब अलग अलग क्यों हैं?

सचेतन मन  द्वारा सोचने का विषय |  the subject of thinking through the conscious mind

  • हम जानते हैं कि सभी मनुष्यों को लगभग एक सा शरीर मिला है। सबके हाथ पैर एक जैसे हैं। परमात्मा ने किसी के साथ कोई अन्याय नहीं किया है फिर भी बाह्य जीवन में कहीं कोई साम्य में नहीं है।
  • आखिर क्यों? अध्यात्म  तत्व के आचार्यों ने चिंतन मनन और गहन अनुसंधान के पश्चात यह निष्कर्ष निकाला कि मनुष्य के भीतर इच्छा आकांक्षा एक ऐसा तत्व है जिसके द्वारा इस संसार में नाना प्रकार की शक्ति सामर्थ्य और योग्यताएं प्राप्त की जा सकती हैं।
  • इस संसार में जिसने जो कुछ भी प्राप्त किया है उसके पीछे उसकी आकांक्षा और इच्छा रही है।
  • मनुष्य जैसा सोचता है और करता है, वह वैसा ही बन जाता है। जिस प्रकार की इच्छा करता है वैसी ही परिस्थितियां उसके निकट एकत्रित होने लगती हैं। जहां इच्छा नहीं वहां कितने ही अनुकूल साधन उपलब्ध हो पर कोई महत्वपूर्ण सफलता हाथ नहीं लग सकती ।
  • कक्षाओं में अधिकांश छात्र इसलिए फेल होते रहते हैं कि पढ़ाई के समय उनका शरीर तो कक्षा में होता है पर मन कहीं और जगत में सैर कर रहा होता है।
  • जो छात्र सुख-सुविधाओं में रह रहे हैं जिनको पर्याप्त जेब खर्च मिलता है उनकी रुचि सुख भोग में लगी रहती है। वे कोई महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त करने की इच्छा ही नहीं रखते हैं। दृढ़ इच्छा और आकांक्षा के बिना पौरुष जागृत नहीं होता और पुरुषार्थ के बिना कोई महत्वपूर्ण सफलता नहीं मिलती।

 जिनकी आकांक्षाएं प्रबल होती हैं, वे साधनहीन होते हुए भी उत्तरोत्तर उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होते रहते हैं।

मन की इच्छाओं को सचेतनता द्वारा चरम लक्ष्य तक पहुंचाना |

consciously bringing the desires of the mind to the ultimate goal

  • मन में जो इच्छा आकांक्षाएं काम कर रही होती हैं उसे पूर्णता प्रदान करने के लिए शरीर की समस्त शक्तियां काम करने लगती हैं। कल्पना, योजना अन्वेषण, निरीक्षण निर्णय आदि अनेक शक्तियां उसी दिशा में क्रियाशील होने लगती हैं। उसी तरह के विचार दौड़े चले आते हैं। अंततः सूझ खड़ी होती है।
  • जब यह सब मिलकर एक साथ काम करना प्रारंभ करते हैं तो इच्छित सफलता स्वयं खींची चली आती है। जब ये शक्तियां इधर-उधर बिखरी पड़ी रहती हैं, तब मनुष्य सफलता के विपरीत असफलता के गर्त में गिरता चला जाता है और मात्र नगण्य सा हाड़ मांस का पुतला भर दिखाई देता है।

जीवन में खोजी प्रवृत्ति का होना आवश्यक है |  It is necessary to have an investigative tendency in life.

  •  खोजी प्रवृत्ति से कुछ छुपा नहीं रह सकता। वह सफलता के स्रोत और साधन ढूंढने में सफल हो जाती है। चोरों को चोर, ठगों का ठग, जुआरियों को जुआरी, दुराचार यों को दुराचारी आसानी से मिल जाते हैं।
  • पढ़ने वाले स्वाध्यायशील छात्रों की दोस्ती ऐसे छात्रों के साथ नहीं देखी जा सकती जो पढ़ते नहीं हैं और न पढ़ने देते हैं। क्योंकि उनकी अभिरुचि एक दूसरे के विपरीत होती है।
  • सफलता तो उधर ही मिलती है जिधर रुचि  होती है जहां लक्ष्य सामने होता है।
  • गोताखोर अथाह समंदर में डुबकी लगाकर उसकी तली में से मोती खोज लाते हैं। रेत के कणों को खोजकर सोने चांदी की खदानों का पता लगा लेते हैं। खोजी प्रवृत्ति में बड़ी प्रेरक शक्ति है। इसी आधार पर मनुष्यों ने आकाश पर राह बना ली है।
  • खोज , इच्छा और आकांक्षा को जो व्यक्ति अस्त्र की तरह काम में लेते हैं उन्हें उन्नति के अनेक साधन उपलब्ध हो जाते हैं।

सफलता की सच्चाई जानना | Knowing the Truth of Success

  • वस्तुतः सफलता का मार्ग कठिन है। इस ऊंचाई पर पहुंचने के लिए मनुष्य को अनेक खतरों, कष्टों और निराशाओं की परीक्षा में सफल होना पड़ता है तब कहीं अभीष्ट सफलता का मुंह देखने को मिलता है। जो इन परीक्षाओं से डर जाते हैं वे असफल ही बने रहते हैं। सफलता की मंजिल क्रमश: धीरे-धीरे पार की जाती है।
  • कई बार प्रयत्न करते करते  भी  असफलता हाथ लगती है ऐसी स्थिति में धैर्य नहीं खोना चाहिए, निराश नहीं होना चाहिए ,बल्कि प्रयत्नों की पुनरावृति का कष्ट झेलते हुए पग पग आगे बढ़ते जाना चाहिए तो मंजिल निकट आती ही जाएगी।
  • छात्रों द्वारा परीक्षा में श्रेणी सुधार का प्रयास इसी कोटि का है। यदि कष्ट सहिष्णु जीवनयापन का अभ्यास किया जाए तो जिन परिस्थितियों में सामान्य व्यक्ति स्वयं को असहाय और निरुपाय पाते हैं उन्हीं में जुझारू व्यक्ति जोश के साथ आगे बढ़ कर सफलता से हाथ मिलाते हैं।
  • वस्तुतः अदम्य उत्साह, अटूट साहस, अविचल धैर्य, खतरों से लड़ने वाला पुरुषार्थ और दृढ़ संकल्प, सफलता तक पहुंचने के मजबूत सोपान कहे जा सकते हैं।
  • जब तक कठिन परिश्रम के प्रति रुचि नहीं पैदा कर ली जाती तब तक अभीष्ट उपलब्धि हाथ नहीं लगती। संसार में न जाने कितना ज्ञान विज्ञान भरा पड़ा है? जब इस ओर मनुष्य का ध्यान गया और उसने रुचि पूर्वक उसमें अपना श्रम नियोजित किया तो वैज्ञानिक आविष्कारों का ढेर लग गया। इन अनुसंधानों में मनुष्य का नियोजित श्रम न जाने अभी कहां कहां तक ले जाएगा।
  • विद्यार्थी जैसे-जैसे श्रम करता है वैसे वैसे ही उसके मस्तिष्क का विकास होता जाता है उसकी स्मृति और समझ का तालमेल विद्यार्थी जीवन की श्रेष्ठतम उपलब्धियां हस्तगत कराता है।
  • इसके अतिरिक्त उसे एक ऐसी दृष्टि प्रदान करता है जिससे वह समूचे संसार में फैले ज्ञान विज्ञान तथा वैभव वर्चस्व की ओर कदम बढ़ाने में समर्थ होता है। जो परिश्रम से मुंह मोड़ते हैं उन्हें उन्नति की आसान नहीं करनी चाहिए।

परिश्रम में सृजन और उत्पादकता का विशेष गुण है। यदि विवेक और व्यवस्था के साथ श्रम किया जाए तो उसका आश्चर्यजनक परिणाम हाथ लगेगा। विद्यार्थी जीवन में ही श्रम के प्रति निष्ठा का भाव जागृत करना चाहिए।

 

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