essay on digestive system in hindi | pachan tantra in hindi

जटिल अघुलनशील कार्बनिक भोज्य पदार्थों को सरल घुलनशील इकाइयों में बदलने की क्रिया पाचन कहलाती है। पाचन के फलस्वरूप शरीर की कोशिकाएं भोज्य पदार्थों का प्रयोग कर सकती हैं। पाचन दो प्रकार से होता है।

contents :-

1- पाचन प्रक्रिया

2- खाद्य पदार्थों का पाचन किस प्रकार होता है?

3-  यांत्रिक पाचन (Mechanical digestion)

4-  रासायनिक पाचन (chemical digestion)

5-  मुख गुहा में पाचन (digestion in  buccal cavity)

6-  आमाशय में भोजन का पाचन (digestion in stomach)

7-  छोटी आत्र में पाचन

8- पचे हुए भोजन का अवशोषण

9- भोज्य पदार्थों में पाए जाने वाले पोषक तत्व

10- कार्बोहाइड्रेट्स

11- वसाएं

12- प्रोटीन्स

13- प्रोटींस की उपयोगिता

14-  विटामिंस

15-  प्रमुख अकार्बनिक भोज्य पदार्थ   

essay on digestive system in hindi

पाचन प्रक्रिया

जटिल अघुलनशील कार्बनिक भोज्य पदार्थों को सरल घुलनशील इकाइयों में बदलने की क्रिया पाचन कहलाती है। पाचन के फलस्वरूप शरीर की कोशिकाएं भोज्य पदार्थों का प्रयोग कर सकती हैं। पाचन दो प्रकार से होता है।

खाद्य पदार्थों का पाचन किस प्रकार होता है?

  • यांत्रिक पाचन (Mechanical digestion):

    मुखगुहा में भोजन को चबाना, आमाशय में भोजन की लुगदी बनाना, आहार नाल की पेशियों में क्रमांकुंचन गतियां आदि यांत्रिक पाचन या भौतिक पाचन कहलाता है।

  • रासायनिक पाचन (chemical digestion):-

    पाचक एंजाइम जटिल अघुलनशील भोज्य पदार्थों पर रासायनिक क्रिया करके उन्हें सरल घुलनशील इकाइयों में बदल देते हैं।

  • मुख गुहा में पाचन (digestion in  buccal cavity):

    मुख गुहा में भोजन का यांत्रिक तथा रासायनिक पाचन होता है। यांत्रिक पाचन के कारण भोजन की लुगदी बनती है, इसमें लार मिल जाती है, भोजन को सुगमता से निकला जा सकता है। लार में उपस्थित टायलिन (ptyalin) एंजाइम के कारण भोजन का लगभग 30% मंड माल्टोज में बदल जाता है। लार में उपस्थित लाइसोजाइम्स भोजन में उपस्थित जीवाणुओं को नष्ट करता है। लार का पीएच मान लगभग 6.8 होता है।

  • आमाशय में भोजन का पाचन (digestion in stomach):-

    भोजन ग्रास नली से होकर आमाशय में पहुंचता है। आमाशय थैली नुमा भाग होता है। इसमें भोजन एकत्र हो जाता है। आमाशय में पेशी है गति के कारण भोजन की लुगदी बन जाती है। आमाशय की जठर ग्रंथियां जठर रस का श्रावण करती हैं। जेठर रस में 97% से 99% जल होता है। इसके अतिरिक्त श्लेष्म 0.2 प्रतिशत से 0.5 प्रतिशत हाइड्रोक्लोरिक अम्ल, पेप्सिन, जेठर लाइपेज तथा रेनिन आदि एंजाइम होते हैं। वयस्क मनुष्य में रेनिन का अभाव होता है। जठर रस अम्लीय होता है इसका पीएच मान 1 से 3.5 तक होता है। हाइड्रोक्लोरिक अम्ल निष्क्रिय पेप्सिनोजन को सक्रिय पेप्सिन में बदलता है, भोजन में उपस्थित जीवाणुओं को मारता है, भोजन को सड़ने से रोकता है और अस्थियों को घुलाता है।

  •  पेप्सिन:-

    यह प्रोटीन को प्रोटिओजेज तथा पेप्टोन में बदलता है।

  • जेठर लाइपेज:

    यह थोड़ी मात्रा में वसा का पाचन करता है।

  • रेनिन:-

    यह प्रोरेनिन के रूप में स्रावित होता है। प्रोरेनिन HCl के H+से क्रिया करके सक्रिय रेनिन में बदल जाता है। सक्रिय रेनिन दूध की केसीन प्रोटीन को अघुलनशील कैल्शियम पैराकेसीनेट में बदल देता है जिससे दूध दही के रूप में बदल जाता है। आमाशय में भोजन 3 से 4 घंटे तक रुकता है। जठर निर्गमी अवरोधनी द्वारा यह भोजन धीरे-धीरे करके छोटी आंत्र के ग्रहणी भाग में पहुंचता है।

  •  छोटी आंत्र में पाचन:

    पाचन मुख्यत: छोटी आंत्र के ग्रहणी भाग में होता है ग्रहणी में पित्ताशय से पित्त रस तथा अग्नाशय से अग्नाशयी रस आते हैं। छोटी आंत्र में स्थित लिबरकुहन की दरारें आंत्रीय रस स्रावित करती हैं।

  • पित्त रस:

    इसके लवण भोजन की वसा का इमल्सीकरण करते हैं। इससे वसा छोटे-छोटे बिंदुओं में टूट जाती है। इसके अतिरिक्त पित्त रस काइम की अम्लता को समाप्त करके इसे क्षारीय करता है, आंसर की क्रमांकुंचन गतियों को बढ़ाता है। पित्त लवण कोलेस्ट्रॉल को घुलनशील बनाए रखते हैं। पित्त, पित्त वर्णकों तथा कोलेस्ट्रॉल को मल के साथ शरीर से बाहर निकालते हैं।

  • अग्न्याशयी रस:-

    यह पूर्ण पाचक रस होता है। यह ग्रहणी में पहुंचकर भोजन का पाचन करता है। अग्न्याशयी रस का पीएच मान 7.5 से 8.3 होता है। अग्न्याशयी रस में 90% जल तथा शेष पाचक एंजाइम व लवण होते हैं। लवणों के कारण अग्न्याशयी रस क्षारीय होता है।

  • आंत्रीय रस:-

    आंत्रीय रस क्षारीय होता है। इसका पीएच मान 7.5 से 8. 3 तक होता है। इसमें जल लवण तथा अनेकों पाचक एंजाइम होते हैं। क्षुद्रांत्र में भोजन के पाचन तथा अवशोषण की क्रिया पूर्ण होती है। क्षुद्रात्र की भीतरी सतह पर रसांकुर में रक्त तथा लसीका केशिकाएं पाई जाती हैं। लसीका केशिकाएं वसा के विखंडन से बने वसीय अम्ल तथा गिल्सरोल का अवशोषण करती है। शेष पचे हुए भोज्य पदार्थों जैसे अमीनो अम्ल, शर्कराएं, विटामिंस, लवण, जल, नाइट्रोजन, क्षारक आदि का अवशोषण रक्त केशिकाएं करती हैं। पचा हुआ भोजन रक्त द्वारा कोशिकाओं में पहुंचकर जीव द्रव्य में आत्मसात हो जाता है, इस क्रिया को स्वांगीकरण कहते हैं। अपचित भोज्य पदार्थों को  मल के रूप में बहिक्षेपित कर दिया जाता है।

  • पचे हुए भोजन का अवशोषण:-

    जब भोजन का पाचन हो जाता है तो पाचन के बाद जल में विलय पोषक तत्वों को उनकी आवश्यकता के स्थान तक पहुंचाने का कार्य अत्यंत आवश्यक है। पचे हुए भोजन का अवशोषण छोटी आंत में होता है। छोटी आंत की अवशोषण सतह रसांकुरों के कारण बढ़ जाती है। विलेय भोजन, रसांकुरों में रुधिर केशिकाओं तथा लसीका वाहिनियों के अंदर उपस्थित तरल में अवशोषित किया जाता है। वसाओं के पाचन से प्राप्त ग्लिसरोल व वसीय अम्ल प्रमुखत: लसीका वाहिनी में अवशोषित होते हैं। बाद में वसाएं वापस रुधिर में ही मिला दी जाती  हैं।

    • स्वांगीकरण:

      रुधिर के प्लाज्मा में हर समय ग्लूकोज, लाइपोप्रोटीन, वसीय अम्ल, ग्लिसरॉल , फास्फोलिपिड्स, अमीनो अम्ल, यूरिया, जल लवण, नाइट्रोजनीय समाक्षार , विटामिन आदि उपस्थित रहते हैं। इसमें से यूरिया को वृक नलिकाएं ग्रहण करके मूत्र के रूप में त्याग देती हैं। अन्य पदार्थों को शरीर की सभी कोशिकाएं अपनी अपनी आवश्यकता के अनुसार कच्चे माल के रूप में ग्रहण करती हैं। इसी को पदार्थों का स्वांगीकरण कहते हैं और स्वांगीकृत पदार्थों को मेटाबोट्स कहते हैं। जल कोशिकाओं में मुख्यतः घोलक का काम करता है। जल कुछ पदार्थों के संश्लेषण में भी भाग लेता है। आवश्यकता से अधिक जल मूत्र निर्माण में भाग लेता है।

  • पोषण (nutrition):-

    जैविक कार्यों के लिए जीवधारी को ऊर्जा की आवश्यकता होती है। ऊर्जा भोज्य पदार्थों से प्राप्त होती है। पौधे स्वपोषी होने के कारण अपने भोज्य पदार्थों का निर्माण स्वयं कर लेते हैं, लेकिन जंतु परपोषी होते हैं। ये अपना भोजन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पौधों से प्राप्त करते हैं। भोज्य पदार्थों को ग्रहण करने की प्रक्रिया पोषण कहलाती है। भोज्य पदार्थों से जीवों को आवश्यक पोषक तत्व प्राप्त होते हैं। पोषक तत्व जीव द्रव्य संश्लेषण में ऊर्जा उत्पादन एवं मरम्मत और वृद्धि में काम आते हैं।

 

भोज्य पदार्थों में पाए जाने वाले पोषक तत्व:

भोजन में पाए जाने वाले पोषक तत्वों को रासायनिक संरचना एवं उपयोगिता के आधार पर निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है-

  • कार्बनिक भोज पदार्थ,
  • अकार्बनिक भोज पदार्थ

कार्बनिक भोज्य पदार्थों में प्रमुख हैं-

  • कार्बोहाइड्रेट्स:-

    इनका निर्माण कार्बन, हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन से होता है। सरल कार्बोहाइड्रेट्स के रूप में शर्कराएं, ग्लूकोज, फ्रक्टोज, लेक्टोज आदि प्रमुख हैं। ये गन्ना, चुकंदर, खजूर, अंगूर आदि में काफी मात्रा में मिलते हैं। जटिल कार्बोहाइड्रेट्स के रूप में मंड प्रमुख खाद्य पदार्थ है, जो आलू, चावल, अरबी, मक्का, साबूदाना आदि में पर्याप्त मात्रा में होता है। कार्बोहाइड्रेट्स जैविक कार्यों के लिए ऊर्जा प्रदान करते हैं। ग्लूकोज को कोशिकीय ईंधन कहते हैं।

  • वसाएं:

    वसा का निर्माण कार्बन हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन के मिलने से होता है । इनमें ऑक्सीजन की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है। पशुओं से यह मक्खन, पनीर, दूध तथा घी से प्राप्त होती है, जबकि वानस्पतिक भोजन में यह नारियल,बादाम ,मूंगफली,सरसों आदि तिलहन के तेलों से प्राप्त किए जा सकते हैं। शरीर में भोज्य पदार्थ वसा के रूप में संग्रहित होते हैं। वसा से ऊर्जा प्राप्त होती है। वसा शरीर ताप नियमन में सहायक होती है। शरीर को सुडौल बनाती है तथा कोशा कला के निर्माण में सहायता करती है।

  • प्रोटीन्स:

    यह जटिल कार्बनिक पदार्थ हैं। इनका निर्माण कार्बन, हाइड्रोजन ऑक्सीजन तथा नाइट्रोजन से होता है। अमीनो अम्लों से प्रोटीन का निर्माण होता है। प्रोटींस अनेक प्रकार के होते हैं तथा भिन्न-भिन्न जीवों में भिन्न भिन्न प्रकार के प्रोटींस होते हैं। जंतु प्रोटीन मांस ,मछली ,दूध ,अंडा, पनीर आदि से प्राप्त होते हैं तथा वनस्पति प्रोटीन प्रमुखत: दालों, गेहूं, मूंगफली, बादाम तथा अन्य सूखे मेवे आदि से प्राप्त होते हैं।

प्रोटींस की उपयोगिता:-

प्रोटींस का प्रमुख कार्य शरीर में टूट-फूट की मरम्मत करना है। यह जीव द्रव्य का निर्माण करने वाला प्रमुख पदार्थ है। विभिन्न प्रकार के एंजाइम्स भी प्रोटीन होते हैं। आवश्यकता पड़ने पर इनके ऑक्सीकरण से ऊर्जा भी प्राप्त होती है। प्रोटींस एंटीबॉडीज बनाकर शरीर की सुरक्षा करती है।

  • विटामिंस:-

    ये जटिल कार्बनिक पदार्थ हैं। ये शरीर की उपापचय क्रियाओं के लिए आवश्यक होते हैं। इन्हें वृद्धि कारक भी कहते हैं। इनकी कमी से अपूर्णता रोग हो जाते हैं। 

    • जल में घुलनशील विटामिन जैसे  विटामिंस बी तथा सी।
    • वसा में घुलनशील विटामिन जैसे विटामिन ए, डी, ई, के।
    •  विटामिंस विभिन्न भोज्य पदार्थों में मिलते हैं जैसे बी कांपलेक्स अंडा ,फल , हरी सब्जियां , यकृत आदि में। सी संतरा,नींबू,टमाटर,आंवला,मौसमी आदि में । विटामिन ए दूध,हरी सब्जी,अंडा,मछली के तेल आदि में। विटामिन डी सूर्य के प्रकाश से त्वचा में बन जाता है तथा दूध,घी आदि में भी मिलता है। विटामिन ई हरी सब्जियों,गेहूं आदि में,।विटामिन के पत्ते वाली सब्जियां, पनीर आदि में पाए जाते हैं।
  • विटामिंस की उपयोगिता:-

    विटामिन से शरीर में उपापचयी क्रियाओं के संचालन में सहायक होते हैं। इनकी कमी से अनेक रोग हो जाते हैं। उदाहरण के लिए, विटामिन ए की कमी से रतौंधी रोग इसमें दिखाई कम देता है विशेषकर रात में, विटामिन बी की कमी से बेरी बेरी रोग इसमें होंठ फट जाते हैं चेहरे पर दाने निकल जाते हैं, विटामिन सी की कमी से स्कर्वी रोग इसमें मसूड़ों का सूजना आदि हो जाता है। विटामिन डी की कमी से रिकेट्स सूखा रोग इसमें हड्डियां टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती है दांत सही से नहीं बनते हैं।

अकार्बनिक भोज्य पदार्थों में प्रमुख हैं-

  • खनिज लवण:- अनेक अकार्बनिक खनिज शरीर की विभिन्न जैविक क्रियाओं को सुचारू रूप से चलाने के लिए आवश्यक होते हैं। खनिज लवण दूध, पनीर ,अंडा ,मछली ,फल ,हरे पत्ते वाली सब्जियां आदि में पाए जाते हैं।
  • खनिज लवणों की उपयोगिता, खनिज लवण अनेक उपापचयी क्रियाओं के लिए आवश्यक होते हैं। कुछ लवण विभिन्न अंगों के निर्माण में आवश्यक होते हैं, जैसे कैल्शियम तथा फास्फोरस दांतो और हड्डियों के लिए अति आवश्यक है। लोहा हीमोग्लोबिन का महत्वपूर्ण अंश है। यह ऑक्सीजन को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाता है। थायराइड अंतः स्रावी ग्रंथि से थायरोक्सिन श्रावण के लिए आयोडीन आवश्यक है।
  • जल तथा इसकी उपयोगिता:- जल जीव द्रव्य का मुख्य भाग है। प्रत्येक कोशिकीय क्रिया जल की उपस्थित में ही होती है। जीव द्रव्य की सक्रियता जल की कमी के साथ कम होती जाती है। जल शरीर के ताप नियमन में सहायक होता है। जल के कारण ही रुधिर विभिन्न पदार्थों को एक स्थान से दूसरे स्थान को स्थानांतरित करता है।

 

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