ashtanga yoga in hindi | Maharshi Pataanjli ashtanga yoga

महर्षि पतंजलि ने योग को “चित्त की वृत्तियों का निरोध” के रूप में परिभाषित किया गया है। यह है- महर्षि पतंजलि-प्रतिपादित अष्टांग योग का पथ। यह कोई मत-पन्थ या सप्रदाय नहीं, अपितु जीवन जीने की सम्पूर्ण पद्धति है। यदि संसार के लोग वास्तव में इस बात को लेकर गम्भीर हैं कि विश्व में शांति स्थापित होनी ही चाहिए, तो इसकामात्र साधन है अष्टांग योग का पालन।

contents :-

1-  अष्टांग योग क्या है  ? – What is Ashtang Yog ?

2-  अष्टांग योग को आठ भागों में बाँटा गया है

3- यम

4- नियम

5- आसन

6-  प्राणायाम

7- प्रत्याहार

8- धारणा

9- ध्यान

10- समाधि

11- यम-नियमों में बाधाएँ-

12- हिंसा के प्रकार जिनसे साधकों को बचना चाहिए 

13- ध्यान के लिए कुछ दिशा-निर्देश

अष्टांग योग क्या है  ? – What is Ashtang Yog ?

Table of Contents

ashtanga yoga in hindi | Maharshi Pataanjli ashtanga yoga

महर्षि पतंजलि ने योग को “चित्त की वृत्तियों का निरोध” के रूप में परिभाषित किया गया है। यह है- महर्षि पतंजलि-प्रतिपादित अष्टांग योग का पथ। यह कोई मत-पन्थ या सप्रदाय नहीं, अपितु जीवन जीने की सम्पूर्ण पद्धति है। यदि संसार के लोग वास्तव में इस बात को लेकर गम्भीर हैं कि विश्व में शांति स्थापित होनी ही चाहिए, तो इसका एकमात्र साधन   है अष्टांग योग का पालन। अष्टांग योग के द्वारा ही वैयक्तिक एवं सामाजिक समरसता, शारीरिक स्वास्थ्य, बौद्धिक जागरण, मानसिक शांति एवं आत्मिक आनन्द की अनुभूति हो सकती है। 

अब हम संक्षेप में इस अष्टांग योग के सम्बन्ध में विचार करते हैं। महर्षि पतंजलि ने अष्टांग योग को योग सूत्रों के माध्यम से लिखा है:-

यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोsष्टावङ्गानि।।

योग के आठ अंगों में सभी प्रकार के योग का समावेश  है। महर्षि पतंजलि को योग का पिता कहा गया है और अष्टाग योग में धर्म और दर्शन की सभी विद्याओं के समावेश के साथ-साथ शारीरिक और मानसिक विज्ञान का मिश्रण है।

 अष्टांग योग को आठ भागों में बाँटा गया है:-

1- यम, 2. नियम, 3. आसन, 4. प्राणायाम, 5. प्रत्याहार, 6. धारणा, 7. ध्यान तथा 8. समाधि-  ये योग के आठ अंग हैं। इन सब योगांगों का पालन किये बिना कोई भी व्यक्ति योगी नहीं हो सकता। यह अष्टांग योग केवल योगियों के लिए ही नहीं, अपितु जो भी व्यक्ति जीवन में स्वयं पूर्ण सुखी होना चाहता है तथा प्राणिमात्र को सुखी देखना चाहता है, उन सबके लिए अष्टांग योग का पालन अनिवार्य है। अष्टांग योग धर्म, अध्यात्म, मानवता एवं विज्ञान की प्रत्येक कसौटी पर खरा उतरता है।

इस दुनिया के आपसी संघर्ष को यदि किसी उपाय से रोका जा सकता है तो वह अष्टांग योग ही है। अष्टांग योग में जीवन के सामान्य व्यवहार से लेकर ध्यान एवं समाधि-सहित अध्यात्म की उच्चतम अवस्थाओं तक का अनुपम समावेश है। जो भी व्यक्ति अपने अस्तित्व की खोज में लगा है तथा जीवन के पूर्ण सत्य को परिचित होना चाहता है, उसे अष्टांग योग का अवश्य ही पालन करना चाहिए। यम और नियम अष्टांग योग के मूल आधार हैं।

1- यम

अष्टांग योग का प्रथम अंग है यम। यम शब्द ‘यमु उपरमे’ धातु से निष्पन्न होता है, जिसका अर्थ है – यम्यन्ते उपरम्यन्ते निवर्त्यन्ते हिंसादिभ्य इन्द्रियाणि यैस्ते यमाः ‘अर्थात् जिनके अनुष्ठान से इन्द्रियों एवं मन को हिंसादि अशुभ भावों से हटाकर आत्मकेन्द्रित किया जाये, वे यम हैं’।

अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह- ये पाँच यम हैं। अब हम यहाँ क्रमश इनका संक्षेप में वर्णन करते हैं।

(क) अहिंसा-

 अहिंसा का अर्थ है किसी प्राणी को मन, वचन तथा कर्म से कष्ट न देना। मन में भी किसी का अहित न सोचना, किसी को कटुवाणी आदि के द्वारा भी कष्ट न देना तथा कर्म से भी किसी भी अवस्था में, किसी भी स्थान पर ‘किसी भी दिन’ किसी भी प्राणी की हिंसा न करना, अपितु प्राणिमात्र से आत्मबल प्रेम तथा सम्पूर्ण सृष्टि के प्रति मैत्री एवं करुणा की दृष्टि रखना यही यथार्थ रूप में अहिंसा है।

(ख) सत्य- 

जैसा देखा, सुना तथा जाना हो, वैसा ही शुद्ध भाव मन में हो, वही प्राणी में तथा उसी के अनुरूप कार्य हो तो वह सत्य कहलाता है। दूसरों के प्रति ऐसी वाणी कभी नहीं बोलनी चाहिए, जिसमें छल-कपट हो, भ्रान्ति पैदा होती हो अथवा जिसका कोई प्रयोजन न हो। ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जिससे किसी प्राणी को दुःख न पहुँचे। वाणी सर्वभूतहिताय होनी चाहिए। दूसरों की हानि करने वाली वाणी पापमयी होने से दुःखजनक होती है। अत परीक्षा करके सब प्राणियों का हित करने वाली वाणी का ही प्रयोग करना चाहिए। 

(ग) अस्तेय- 

अस्तेय का अर्थ है चोरी न करना। दूसरों की वस्तु पर बिना पूछे अधिकार करना अथवा शास्त्रविरुद्ध ढंग से वस्तुओं का ग्रहण करना स्तेय (चोरी) कहलाता है। दूसरों की वस्तु को प्राप्त करने की मन में लालसा भी चोरी है। अत योगी पुरुष को न तो चोरी करनी चाहिए, न ही किसी से करवानी चाहिए, अपितु अपने सात्विक व पूर्ण पुरुषार्थ से तथा भगवान् की कर्मफल व्यवस्था के अनुरूप या प्रकृति के विधान से जो कुछ हमें प्राप्त होता है उसमें पूर्ण सन्तुष्ट एवं आनन्दित रहना चाहिए।

(घ) ब्रह्मचर्य-

 कामवासना को उत्तेजित करनेवाले खान-पान, दृश्य-श्रव्य एवं शृंगारादि का परित्याग कर सतत वीर्य-रक्षा करते हुए ऊर्ध्वरेता होना ब्रह्मचर्य कहलाता है। अष्टविध मैथुन-वासना की दृष्टि से किसी का दर्शन, स्पर्शन, एकान्त-सेवन, भाषण, विषय-कथा, परस्पर क्रीड़ा, विषय का ध्यान तथा संग (sex) ये आठ प्रकार के मैथुन हैं। ब्रह्मचारी को इनसे बचते हुए सदा जितेन्द्रिय होकर अपनी समस्त इन्द्रियों आँख, कान, नाक, त्वचा एवं रसना को सदा शुभ की ओर प्रेरित करना चाहिए तथा मन में सदा भद्र, सुविचार, शिव-संकल्प रखना चाहिए।

(ङ) अपरिग्रह- 

परिग्रह का अर्थ है चारों ओर से संग्रह (इकट्ठा) करने का प्रयत्न करना। इसके विपरीत जीवन जीने के लिए न्यूनतम, धन, वस्त्र आदि पदार्थों एवं मकान से सन्तुष्ट होकर जीवन के मुख्य लक्ष्य ईश्वर-आराधना करना अपरिग्रह है। साधक एवं प्रत्येक विवेकशील मनुष्य को इस विचार के साथ जीवन को जीना चाहिए कि क्या इसके बिना भी मेरे जीवन का निर्वाह हो सकता है यही योगवृत्ति है यही अपरिग्रह है इसके विपरीत भोगवृत्ति या उपभोक्तावाद है। ईश्वरीय व्यवस्था के अनुसार जीवन में जो कुछ भी धन, वैभव, भूमि, भवन आदि ऐश्वर्य हमें प्राप्त हों, उनको कभी अहंकार के वशीभूत होकर अपना नहीं मानना चाहिए तथा भौतिक सुख तथा बाह्य सुख के साधनों की इच्छा भी साधक को नहीं करनी चाहिए। अनासक्त भाव से जीवन जीते हुए अपने-आप जो भी सुख-साधन उपलब्ध हों, उनका उपयोग दूसरों को सुख पहुँचाने व सेवा के लिए करना चाहिए। 

2- नियम

अष्टांग योग में नियम के पाँच भेद बताए गए है :- शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान। मनुष्य को अपने जीवन में नियम के अनुसार कार्य करना चाहिए।

(क) शौच- 

शौच कहते हैं शुद्धि को, पवित्रता को। यह शौच, शुचिता या पवित्रता भी दो प्रकार की होती हैः एक बाह्य, दूसरी आभ्यन्तर। 

साधक को प्रतिदिन जल से शरीर की शुद्धि, सत्याचरण से मन की शुद्धि, विद्या और तप के द्वारा आत्मा की शुद्धि तथा ज्ञान के द्वारा बुद्धि की शुद्धि करनी चाहिए। भगवती गंगा आदि के पवित्र जल से भी शरीर की शुद्धि हो सकती है। मन, बुद्धि एवं आत्मा की शुद्धि के लिए तो ऋषियों द्वारा बताये गये उपायों को करना ही होगा।

(ख) सन्तोष- 

अपने पास विद्यमान समस्त साधनों से पूर्ण पुरुषार्थ करें। जो कुछ प्रतिफल मिलता है, उससे पूर्ण सन्तुष्ट रहना और अप्राप्त की इच्छा न करना, अर्थात् पूर्ण पुरुषार्थ एवं ईश्वर-कृपा से जो प्राप्त हो, उसका तिरस्कार न करना तथा अप्राप्त की तृष्णा न रखना ही सन्तोष है।

 महर्षि व्यास कहते हैं-

सन्तोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम्। कुतस्तद्धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम्।।

सन्तोष-रूपी अमृत के पान करने से तृप्त हुए शान्तचित्त मनुष्यों को जो आत्मिक और हार्दिक सुख मिलता है, वह धन-वैभव की लालच व व्याकुलता में इधर-उधर भटकने वा जेले मनुष्यों को कभी नहीं मिल सकता। अन्यत्र भी कहा है –‘सन्तोषमूलं हि सुखं दुःखमूलं विपर्यय’। सुख का मूल आधार सन्तोष है और इसके विपरीत तृष्णा-लालसा दुःखों का मूल है। उपनिषद् में ऋषि कहते हैं- ‘न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्य’। धन के द्वारा मनुष्य की कभी तृप्ति नहीं हो सकती। अतः साधक को पूर्ण पुरुषार्थ करते हुए उसका जो भी प्रतिफल ईश्वर अपनी न्यायव्यवस्थानुसार प्रदान करते हैं, उसमें पूर्ण सन्तुष्ट रहना चाहिए । यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि ईश्वर सदा ही हमारी आवश्यकता और पात्रता से अधिक ही हमें रूप, यौवन, धन, समृद्धि एवं समस्त वैभव प्रदान करते हैं।

(ग) तप- 

महर्षि व्यासदेव कहते हैं- ‘तपो द्वन्द्वसहनम्’ अर्थात् अपने सद्-उद्देश्य की सिद्धि में जो भी कष्ट, बाधाएँ, प्रतिकूलताएँ आयें, उनको सहजता से स्वीकार करते हुए, निरन्तर, बिना विचलित हुए, अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ना तप कहलाता है। महाभारत में आता है कि जब यक्ष युधिष्ठिर से प्रश्न करता है- ‘तपस किं लक्षणम्’ तो महाराज युधिष्ठिर उत्तर देते हैं- ‘तप स्वधर्मवर्तित्वम्’। हे यक्ष! अपने कर्त्तव्य के पालन में जो भी विघ्न-बाधाएँ आयें, उन्हें सहते हुए निरन्तर अपने स्वधर्म का पालन करना ही तप है। ये द्वन्द्व हैं- भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख, हानि-लाभ, मान-अपमान, स्तुति-निन्दा, सत्कार-तिरस्कार, जय-पराजय आदि। इन सब प्रतिकूलताओं में सम रहना तप है, न कि अग्नि के बीच तपना या एक पैर पर खड़े होकर अपने शरीर को अनावश्यक व अवैज्ञानिक रूप से कष्ट देना आदि।

(घ) स्वाध्याय-

 महर्षि व्यास कहते हैं- ‘प्रणवादिपवित्राणां जपो मोक्षशास्त्राणामध्ययनं वा’। अर्थात् प्रणव-ओंकार का जप करना तथा मोक्ष की ओर ले जाने वाले वेद-उपनिषद्, योगदर्शन, गीता आदि जो सत्यशास्त्र हैं, इनका श्रद्धापूर्वक अध्ययन करना स्वाध्याय है। हम यदि इस स्वाध्याय शब्द पर शाब्दिक दृष्टि से विचार करें तो इसके मुख्यार्थ दो हैं। एक है- ‘सु-अध्ययनं स्वाध्याय’ अर्थात् उत्तम अध्ययन। ऋषि-प्रतिपादित सत्-शास्त्रों का पूर्ण श्रद्धा और आस्था के साथ अध्ययन करना। उत्तम ग्रन्थों के अध्ययन से हमारे विचारों एवं संस्कारों में पवित्रता, दिव्यता तथा दृढ़ता आती है और विचारों की पवित्रता एवं दृढ़ता से ही जीवन में सात्त्विकता आती है। दूसरा स्वाध्याय का अर्थ है- स्व-अध्ययन, अर्थात् अपना अध्ययन, अपने-आपको पढ़ना, अपने अस्तित्व के सम्बन्ध में चिन्तन, विचार तथा निदिध्यासन करना कि मैं कौन हूँ? मुझे क्या करना चाहिए? मैं क्या कर रहा हूँ? मेरे जीवन का क्या लक्ष्य है? मुझे किसने पैदा किया है? और क्यों पैदा किया है?

इस प्रकार साधक सजग होकर विवेकपूर्वक विचार करेगा तो वह बाहर के वैभव में न फँसकर प्रणव (ओंकार) का जप तथा ऋषि-प्रतिपादित अध्यात्मविद्या, पराविद्या के ग्रन्थों का अध्ययन करता हुआ परमेश्वर का सान्निध्य प्राप्त कर सफल हो सकता है।

(ङ) ईश्वर-प्रणिधान-

 महर्षि व्यास कहते हैं- ‘तस्मिन् परमगुरौ सर्वक्रियाणामर्पणम्’। अर्थात्, उस गुरुओं के भी गुरु, परम गुरु परमात्मा में अपने समस्त कर्मों का अर्पण कर देना। भगवान् को हम वही समर्पित कर सकते हैं, जो शुभ है, दिव्य एवं पवित्र है। इसलिए साधक पूर्ण श्रद्धा, भक्ति एवं सर्वात्मना प्रयत्न से वही कार्य करेगा, जिसे वह भगवान् को समर्पित कर सके, अर्थात् उसकी समस्त क्रियाओं का ध्येय ईश्वर-अर्पण होगा। सच्चा भक्त सदा यही विचार करता है कि मुझे जीवन में शरीर, मन, बुद्धि, शक्ति, रूप, यौवन, समृद्धि, ऐश्वर्य, पद, सत्ता, मान आदि जो कुछ वैभव मिला है, सब ईश्वर-कृपा से ही मिला है। इसलिए मुझे अपनी समस्त शक्तियों का उपयोग अपने प्रियतम प्रभु को प्रसन्न करने के लिए ही करना है। इस जीवन का सम्पूर्ण प्रयास तथा पुरुषार्थ मेरा यही है कि मैं सब कुछ, अपने अस्तित्व-सहित, प्रभु में अर्पण कर दूँ और ऐसे भक्त पर ही भगवान् की कृपा एवं ईश्वरीय अमृत सदा बरसता है, जो सर्वात्मना ईश्वर के प्रति समर्पित हो जाता है।

यम-नियमों में बाधाएँ-

इन यम-नियमों का पालन करने में कई प्रकार की विघ्न-बाधाएँ हैं, जो हमें योग से विचलित करती हैं। महर्षि पतञ्जलि कहते हैं-

वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम्। (योगसूत्र- 2.33)

यम-नियमों के अनुष्ठान में, इनके विपरीत हिंसा, असत्य, चोरी, असंयम, परिग्रह तथा अशुचिता, असन्तोष, विलासिता, स्वाध्याय का अभाव आत्म विमुखता तथा नास्तिकता ईश्वर से विमुखता अधर्म है। इनके प्रतिपक्ष का चिन्तन करके इनसे बचना चाहिए। साधक को एक बार यह दृढ़ निश्चय कर लेना चाहिए कि मैंने इस दुःखमयी संसाराग्नि के ताप से बचने के लिए जो इन हिंसा, असत्य, चोरी, असंयमादि वितर्कों का परित्याग किया है, इन हिंसादि को मैं भूलकर भी ग्रहण नहीं करूँगा; क्योंकि मैंने विवेकपूर्वक निश्चय करके इन दोषों का परित्याग किया है। अब मुझे श्वानवृत्ति (अर्थात् जैसे कुत्ता उल्टी करने के बाद चाट लेता है, उसी तरह) नहीं होना। मैं दृढ़ निश्चय होकर इन महाव्रतों का श्रद्धापूर्वक पूरी शक्ति के साथ पालन करूँगा, यही मेरे जीवन का स्वधर्म है। ऐसा कहते हुए यदि मुझे मरना भी पड़े तो मुझे ‘स्वधर्मे निधनं श्रेय’ स्वीकार है।

ये वितर्क क्या हैं? तथा इनसे बचने की प्रतिपक्ष-भावना क्या है? 

इसके सम्बन्ध में महर्षि पतंजलि कहते हैं-

वितर्का हिंसादय कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोहपूर्वका

मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम्।  (योगसूत्र- 2.34)

ये हिंसा, असत्य, चोरी सत्य आदि वितर्क (कृत्य- अर्थात् स्वयं किये हुए, कारित-दूसरों के द्वारा कराये गये और अनुमोदित-अनुमोदन (समर्थन) किये गये) लोभ, क्रोध और अज्ञान के कारण उत्पन्न होने वाले हैं। ये मृदु, मध्य और तीव्र भेदवाले तथा अनन्त-असीम दुःख और अज्ञान रूप फल देनेवाले हैं। यह विचार ही प्रतिपक्ष भावना या चिन्तन है। इन हिंसा एवं असत्यादि वितर्कों (बाधाओं) में से हम उदाहरणार्थ हिंसा को लेते हैं।

हिंसा के प्रकार जिनसे साधकों को बचना चाहिए 

यह हिंसा तीन प्रकार की होती है। प्रथम कृत- स्वयं अपने मन, वचन तथा कर्म से किसी की हिंसा करना; द्वितीय कारित- स्वयं प्रत्यक्ष रूप से तो किसी की हिंसा नहीं करना, परन्तु दूसरों से करवाना, तथा तृतीय अनुमोदित- हिंसा के लिए दूसरों को प्रेरित करना या दूसरों द्वारा की गई हिंसा का अनुमोदन करना। तीन प्रकार की हिंसाओं के लोभ, क्रोध और मोहपूर्वक होने से पुन तीन-तीन भेद हैं। मांस, चमड़ा, भूमि, भवन तथा अन्य किसी लोभ के लिए कृत, कारित तथा अनुमोदित लोभजन्य हिंसा है। इसी प्रकार क्रोधजन्य हिंसा (कृत, कारित तथा अनुमोदित तीनों प्रकार की) इसलिए करना कि इस हिंसित होनेवाले प्राणी ने मेरा कोई अनिष्ट किया है। मोह के कारण कृत, कारित तथा अनुमोदित हिंसा इसलिए की जाती है कि मेरी स्त्राr, पुत्र अथवा किसी प्रियजन का स्वार्थ सिद्ध होने से मेरा स्वार्थ सिद्ध हो जायेगा।

लोभ, क्रोध एवं मोहपूर्वक की गई हिंसा के पुन प्रत्येक के तीन-तीन भेद किये गये हैं-मृदु, मध्य एवं अधिमात्र। लोभ, क्रोध, मोह की मात्रा कम होने से मृदु हिंसा (हिंसा कम मात्रा में), इनकी मात्रा मध्य स्तर एवं अधिक स्तर होने से हिंसा भी मध्यस्तर एवं अधिमात्र स्तर की होती है। इन मृदु, मध्य, अधिमात्र की हिंसा में भी प्रत्येक के पुन तीन-तीन भेद किये गये हैं। 

 (1) मृदु-मृदु- मृदुस्तर की हिंसा में सबसे कम हिंसा का होना; (2) मध्य मृदु- मृदु हिंसा से कुछ अधिक हिंसा होना; (3) तीव्र मृदु- मृदु स्तर की ही सीमा में सबसे अधिक हिंसा का होना। इसी तरह से ‘मध्यस्तर’ एवं ‘अधिमात्रस्तर’ हिंसा के भी तीन-तीन भेद होते हैं। इस प्रकार हिंसा 81 प्रकार की होती है। यह 81 भेदों वाली हिंसा नियम, विकल्प और समुच्चय-भेद से असंख्य भेदों वाली हो जाती है।

 असत्य, चोरी, अब्रह्मचर्य, ब्रह्मचर्य तथा परिग्रह भी स्वयं करना, दूसरों से करवाना तथा कोई अन्य कर रहा हो तो उसका अनुमोदन करना भी साधक के लिए बाधक है। स्वयं झूठ न बोलकर दूसरों से बुलवाना तथा झूठे व्यक्तियों का अनुमोदन करना भी असत्य ही है। इसी प्रकार चोरी करना, दूसरों से करवाना तथा अनुमोदन करना सब चोरी के अन्तर्गत ही है। स्वयं तो ब्रह्मचर्य का पालन न करना, परन्तु दूसरों को ब्रह्मचर्य-पालन करवाना तथा ब्रह्मचर्य के लिए प्रेरित करना भी पूर्ण ब्रह्मचर्य नहीं हो सकता। इसी प्रकार अपरिग्रह के विषय में जानना चाहिए।

कृत-कारित-अनुमोदित की तरह ही असत्य-चोरी आदि के अन्य लोभ-क्रोध-मोहपूर्वक आदि भेद हिंसा की तरह ही समझने चाहिए और साधक को अपने मन में यह दृढ़ संकल्प धारण करना चाहिए कि ये वितर्क निश्चय ही दुःख-रूप तथा अज्ञान-रूप अनन्त अशुभ फलों के देने वाले हैं। इस प्रकार प्रतिपक्ष-वितर्क एवं विरोधी भावना बनाकर हिंसा, असत्य आदि से बचकर निरन्तर योगानुष्ठान करते हुए आत्मसाक्षात्कार के मार्ग पर निरन्तर आगे बढ़ना चाहिए।

3- आसन

ashtanga yoga in hindi | Maharshi Pataanjli ashtanga yoga

पद्मासन, भद्रासन, सिद्धासन या सुखासन आदि किसी भी आसन में स्थिरता और सुखपूर्वक बैठना आसन कहलाता है। साधक को जप, उपासना एवं ध्यान आदि करने के लिए किसी भी आसन में स्थिरता और सुखपूर्वक बैठने का लम्बा अभ्यास भी करना चाहिए। जो इन आसनों में नहीं बैठ सकते या रोगी हैं, उनके लिए महर्षि व्यास कहते हैं कि वे सोपाश्रय आसन, अर्थात् कुर्सी अथवा दीवार आदि का भी आश्रय (सहारा) लेकर प्राणायाम-ध्यान आदि का अभ्यास कर सकते हैं। जप एवं ध्यानादि-रूप उपासना के लिए आसन का अभ्यास अति आवश्यक है। किसी ध्यानात्मक आसन के करते समय मेरुदण्ड सदा सीधा होना चाहिए। भूमि समतल हो, बिछाने के लिए गद्दीदार वस्त्र, कुशा या कम्बल आदि ऐसा आसन होना चाहिए जो विद्युत का कुचालक तथा आरामदायक हो। उपासना के लिए एकान्त स्थान, शुद्ध वायु, मक्खी-मच्छर आदि से रहित वातावरण उपयुक्त है।

आज समाज में कुछ ऐसी भ्रान्तियाँ फैलती जा रही हैं कि कुछ लोग मात्र योग के कुछ आसनों को करके अपने-आप को योगी कहने लगते हैं और कुछ लोग उनको योगी भी समझने लगते हैं। योगासन तो योग का एक अंगमात्र है। योगी होने के लिए तो अहिंसा, सत्य, अस्तेय व ब्रह्मचर्यादि रूप यम-नियमों सहित अष्टांग योग का पूर्ण पालन करते हुए दीर्घकाल तक श्रद्धापूर्वक समाधि का अभ्यास करना पड़ता है।

4- प्राणायाम

आसन के स्थिर हो जाने पर श्वास लेने व श्वास को छोड़ने की स्वाभाविक गति का विच्छिन्न होना प्राणायाम कहलाता है। बाह्यवृत्ति, आभ्यन्तरवृत्ति, स्तम्भवृत्ति- इन भेदों वाला प्राणायाम, देश, काल एवं संख्या के द्वारा नापा गया दीर्घ और सूक्ष्म होता जाता है। चौथा प्राणायाम बाह्य और आभ्यन्तर विषयक प्राण के आक्षेप अर्थात् आलोचन स्वरूप वाला होता है।

प्राणायाम के नियमित अभ्यास से प्रकाशावरण कमजोर पड़ने लगता है तथा धारणाओं का अनुष्ठान कर सकने की मानसिक-सक्षमता की प्राप्ति भी होती है। किसी भी एक ध्यानात्मक आसन में बैठकर श्वास प्रश्वासों पर नियत्रण करके प्राणशक्ति के द्वारा शरीर, इन्द्रियों व मन का शुद्धिकरण व दिव्य रूपान्तरण यह प्राणायाम है। महर्षि पतंजलि ने बाह्य, आभ्यन्तर, स्तम्भवृत्ति तथा बाह्याभ्यन्तरविषयक्षेपी- इन चार प्राणायामों का प्रमुखता से वर्णन किया है।

प्राणायाम का अर्थ है सांस को अन्दर लेना और बाहर छोडना। प्राणायाम मन की चंचलता पर अंकुश लगाना और एकाग्र करने में बहुत सहायक होता है।

5- प्रत्याहार

इन्द्रियों के अपने-अपने विषय रूप-रसादि का सन्निकर्ष न होने पर चित्तवृत्ति के अनुरूप ही इन्द्रियाँ हो जाती हैं, इसलिए जब साधक विवेक-वैराग्य आदि से अपने मन के ऊपर नियत्रण कर लेता है, तब इन्द्रियों का जीतना अपने-आप हो जाता है, क्योंकि मन ही इन्द्रियों को चलानेवाला है। यह मनोजय अथवा विषयों से विमुख होकर मन तथा इन्द्रियों को अन्तर्मुखी करना ही प्रत्याहार है। आङ्पूर्वक ‘हृ’ धातु आहरण-आकृष्ट करने के अर्थ में प्रयुक्त होती है। प्रति उपसर्ग से उसके विपरीत अर्थ (विमुख होने) को द्योतित किया गया है। इस प्रत्याहार का फल बताते हुए महर्षि पतंजलि कहते हैं- 

तत परमा वश्यतेन्द्रियाणाम्। (योगसूत्र-2.55)।।

प्रत्याहार के द्वारा साधक का इन्द्रियों पर पूर्ण अधिकार हो जाता है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धादि की आसक्ति व्यक्ति को आत्मकल्याण के रास्ते से दूर हटाती है। एक-एक इन्द्रिय की आसक्ति मन को विचलित कर देती है। इन्द्रियों के विषयों (रूप-रसादि) में आसक्ति रखनेवाले व्यक्ति की प्रीति भोगों में होती है, भगवान् में नहीं। इसलिए अभ्यास और वैराग्य के द्वारा यथार्थ बोध से ही प्रत्याहार सिद्ध होने पर यह इन्द्रिय-जय होता है। फिर साधक को भगवान् में प्रीति, परम रस और परम सुख का अनुभव होने लगता है और सारा संसार दुःखमय प्रतीत होता है-

परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिन। (योगसूत्र-2.15)।। 

कर्माशय (संचित कर्मों का समूह) का विपाक (फल) ही जन्म, आयु और भोग होता है। ये जन्म, आयु तथा भोग पुण्य कर्मों के कारण सुखमय तथा अपुण्य कर्मों के कारण दुःखमय होते हैं। परन्तु योगी के लिए लौकिक विषयों का सुख भी दुःखमय ही होता है। इसका कारण यह है कि यह शब्द, स्पर्श, रूप, रस आदि वासनारूप विषय-सुख, व्यक्ति को अविद्यावश ही प्रतीत होता है। जब इन सुखों के परिणाम आदि पर विचार किया जाये, तब निश्चित रूप से हम पायेंगे कि ये समस्त सांसारिक सुख भी दुःखमय ही होते हैं, क्योंकि ये सुख प्राणियों को पीड़ा दिये बिना नहीं भोगे जा सकते तथा इन सुखों में भी सूक्ष्म परिणाम-सन्ताप एवं संस्कार-रूप से जो दुःख मिश्रित हैं, उन्हें सामान्यजन अनुभव नहीं कर पाते। किन्तु योगी उनके परिणामों को जान लेता है। अत उसके लिए लोगों को सुख प्रतीत होने वाला लौकिक सुख भी दुःखमय ही है। इसलिए साधक दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति के लिए ईश्वर-प्राप्ति हेतु पूर्ण पुरुषार्थ करता है।

इंद्रियों को नियंत्रण में रखाना ही प्रत्याहार है। आँख, कान, नाक आदि इन्द्रियों को संसार के विषयों से हटाकर मन को एकाग्र करना प्रत्याहार कहलाता है। प्रत्याहार के माध्यम से आप अपनी इन्द्रियों को बाहरी विषयों से विमुख करके अंतरात्मा की ओर मोडना होता है।

6- धारणा

नाभिचक्र, हृदय-पुण्डरीक, मूर्धाज्योति, भ्रूमध्य, नासिकाग्र, जिह्वाग्र इत्यादि प्रदेशों में से किसी एक स्थान पर मन का निग्रह या एकाग्र होना धारणा कहलाता है। प्रत्याहार द्वारा जब इन्द्रियाँ एवं मन एक प्रकार से स्थूल विषय से हटाकर सूक्ष्म लक्ष्य आत्मा-परमात्मा आदि पर केन्द्रित करने को धारणा कहते हैं। धारणा ध्यान की नींव है। ज्यों-ज्यों धारणा का अभ्यास सुदृढ़ होगा, ध्यान भी साथ-साथ होने लगेगा।

मनुष्य को अपने चित्त को एक स्थान पर केंद्रित करना ही धारणा कहलाता है। धारणा में व्यक्ति को अपने मन को एकाग्रचित करके परमात्मा में ध्यान लगाना होता है, उसी को धारणा कहते है।

7- ध्यान

ashtanga yoga in hindi | Maharshi Pataanjli ashtanga yoga

उस धारणा किये हुए, अर्थात् नाभिचक्र, भ्रूमध्य या हृदय आदि में ध्येय रूप परमेश्वर में प्रत्यय एकतानता-ज्ञान का सदृशप्रवाह (एक-सा प्रवाह) ध्यान है। जैसे नदी जब समुद्र में प्रवेश करती है, तब वह समुद्र के साथ एकाकार हो जाती है, सदृश-प्रवाह हो जाती है। वैसे ही ध्यान के समय सच्चिदानन्द परमेश्वर के अतिरिक्त अन्य विषय का स्मरण नहीं करना, अपितु उसी अन्तर्यामी ब्रह्म के आनन्दमय, ज्योतिर्मय एवं शान्तिमय स्वरूप में मग्न हो जाना ध्यान है।

ध्यान हमारे जीवन के साथ प्रतिपल जुड़ा हुआ है। भारतीय संस्कृति में तो ध्यान प्रत्येक क्रिया का पूरक होता था। इसीलिए आज भी हमें अपने घर एवं परिवार के बड़े व्यक्ति किसी कार्य को विधिवत् सम्पन्न करने हेतु जब कहते हैं, तब सर्वत्र यही वाक्य होता है- भाई ध्यान से पढ़ना, ध्यान से चलना, प्रत्येक कार्य को ध्यान से करना। आज हम ध्यान शब्द का प्रयोग तो करते हैं, परन्तु यह ध्यान क्या है, उस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है। लेकिन जीवन के प्रत्येक कार्य के साथ जुड़े इस ध्यान शब्द से हम यह तो जान ही सकते हैं कि ध्यान जीवन का अपरिहार्य अंग है। ध्यान के बिना जीवन अधूरा है। ध्यान के बिना हम अपने किसी भी भौतिक तथा आध्यात्मिक लक्ष्य में सफल नहीं हो सकते। ध्यान से ही हम सदा आनन्दमय एवं शान्तिमय जीवन जी सकते हैं। यद्यपि ध्यान अपने-आपमें एक बहुत बड़ी यौगिक प्रक्रिया है, तथापि ध्यान की कुछ विधियों पर हम संक्षेप में प्रकाश डालेंगे, जिससे साधकों को कुछ दिशा-निर्देश मिल सके।

ध्यान के लिए कुछ दिशा-निर्देश

ध्यान करने से पहले प्राणायाम अवश्य करें; क्योंकि प्राणायाम के द्वारा मन पूर्ण शान्त एवं एकाग्र हो जाता है। शान्त मन के द्वारा ही धारणा और ध्यान हो सकते हैं।

कपालभाति और अनुलोम-विलोम प्राणायाम विधिपूर्वक करने से मन निर्विषय हो जाता है, अतः ध्यान स्वत: लगने लगता है। साधक जब कम से कम 10-15 मिनट कपालभाति और 5 और 10 मिनट अनुलोम-विलोम-प्राणायाम करता है, तब उसके मूलाधार चक्र में सन्निहित ब्रह्म की दिव्यशक्ति जागरित होकर ऊर्ध्वगामी होने लगती है, जिससे समस्त चक्रों और नाड़ियों का शोधन हो जाता है। आज्ञाचक्र में, एक दिव्य ज्योतिपुंज में, सच्चिदानन्द-स्वरूप ओंकार में मन अवस्थित होने लगता है। अत्यन्त चंचल मन भी प्राणायाम के द्वारा एकाग्र हो जाता है।

ध्यान करते समय ध्यान को ही सर्वोपरि महत्त्व दें। ध्यान के समय किसी भी अन्य विचार को, चाहे वह कितना ही शुभ क्यों न हो, महत्त्व न दें। दान करना, सेवा एवं परोपकार करना, विद्याध्ययन, गुरु, राष्ट्र एवं विश्व की सेवा तथा गोसेवा आदि पवित्र कार्य हैं, परन्तु इनका भी ध्यान के समय ध्यान या चिन्तन न करें। ध्यान के समय चिन्तन, मनन, निदिध्यासन एवं साक्षात्कार का लक्ष्य ईश्वर ही होना चाहिए।

ध्यान के समय मन एवं इन्द्रियों को अन्तर्मुखी बनायें तथा ध्यान से पहले प्रतिदिन मन में यह चिन्तन भी अवश्य करें कि मैं प्रकृति, धन, ऐश्वर्य, भूमि, भवन, पुत्र, पौत्र, भार्या आदि रूप नहीं हूँ। ये सब व्यक्त-अव्यक्त सत्त्व मेरे स्वरूप नहीं हैं। मैं समस्त जड़ एवं चेतन बाह्य पदार्थों के बन्धन से परे हूँ। यह शरीर भी मेरा स्वरूप नहीं है। मैं शरीर, इन्द्रियाँ तथा इन्द्रियों के विषय (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध आदि) से रहित हूँ। मैं मन तथा मन के विषय, काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार आदि वासना-रूप नहीं हूँ। मैं अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश-रूप पंचक्लेशों से भी रहित हूँ। मैं आनन्दमय, ज्योतिर्मय, प्रकाशमय, शान्तिमय, परम सुखमय, त्रिगुणातीत, भावातीत, शुद्धसत्त्व हूँ। मैं अमृतपुत्र हूँ। मैं उसी ब्राह्मी चेतना में अवस्थित हूँ। जैसे बूँद समुद्र से आकाश की ओर उठती है, फिर भूमि पर गिरकर नदियों के प्रवाह से होकर पुन सागर में ही समाहित हो जाती है, सागर को छोड़कर बूँद रह नहीं सकती है, मैं भी उस आनन्द के सिन्धु परमेश्वर में बूँद से समुद्र-रूप होना चाहता हूँ। वही विधाता हमें जीवन, प्राण, शक्ति, गति, ओज, शान्ति, सुख एवं समस्त भौतिक ऐश्वर्य प्रदान करता है। वही प्रभु मुझे सतत आनन्द दे रहा है, प्रभु की शान्ति एवं परम सुख मुझपर सब ओर से बरस रहा है। एक पल भी वह आनन्दमयी माँ एवं परम रक्षक पिता मुझे अपने से दूर नहीं करता। मैं सदा प्रभु में हूँ और प्रभु सदा मुझमें हैं, यह तादात्म्य-भाव, तद्रूपता एवं तदाकार भाव ही हमें परम आनन्द प्रदान करेगा। भगवान् अपने आनन्द की अजस्र वृष्टि कर रहे हैं। यदि हम फिर भी उस आनन्द को अनुभव न करें तो इसमें हमारा ही दोष है।

साधक को सदा विवेक-वैराग्य के भाव में रहना चाहिए। स्वयं को द्रष्टा-साक्षीभाव में अवस्थित रखकर अनासक्त भाव से समस्त शुभ कार्यों को भगवान् की सेवा मानकर करना चाहिए। कर्त्तृत्व का अहंकार व फल की अपेक्षा से रहित कर्म भगवान् का क्रियात्मक ध्यान है।

बाह्य सुखप्राप्ति का विचार एवं सुख के समस्त साधन सब दुःख-रूप हैं। संसार में जब तक सुख-बुद्धि बनी रहेगी, तब तक भगवत्समर्पण, ईश्वर-प्रणिधान नहीं हो सकेगा तथा बिना ईश्वर-प्रणिधान के ध्यान एवं समाधि तक पहुँचना असम्भव है।

8- समाधि

तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधि। (योगसूत्र- 3.3)

ध्यान में जब केवल ध्येयमात्र (ईश्वर) के स्वरूप या स्वभाव को प्रकाशित करनेवाला अपने स्वरूप से शून्य जैसा होता है, तब उसे समाधि कहते हैं। आनन्दमय, ज्योतिर्मय एवं शान्तिमय परमेश्वर का ध्यान करता हुआ साधक ओंकार ब्रह्म परमेश्वर में इतना तल्लीन, तन्मय एवं तद्रूप-सा हो जाता है कि वह स्वयं को भी भूल-सा जाता है, मात्र भगवान् के दिव्य आनन्द का अनुभव होने लगता है, यही स्वरूपशून्यता है। मृत्युञ्जय महायोगी महर्षि दयानन्द जी महाराज कहते हैं कि ध्यान एवं समाधि में इतना ही भेद है कि ध्यान में तो ध्यान करने वाला, जिस मन से, जिस तत्त्व का ध्यान करता है, वे तीनों (ध्याता, ध्येय और ध्यान) विद्यमान रहते हैं। परन्तु समाधि में केवल परमेश्वर के आनन्दमय, शान्तिमय, ज्योतिर्मय स्वरूप एवं दिव्य-ज्ञान-आलोक में आत्मा निमग्न हो जाता है, वहाँ तीनों का भेदभाव नहीं रहता। जैसे मनुष्य जल में डुबकी लगाकर थोड़ी समय भीतर ही भीतर रुका रहता है, वैसे ही जीवात्मा परमेश्वर के आनन्द में मग्न होकर समाधि जाता है, वैसे ही परमेश्वर के दिव्यज्ञान के आलोक में आत्मा प्रकाशमय होकर अपने शरीर आदि को भी भूले हुए के समान जानकर स्वयं को परमेश्वर के प्रकाश-स्वरूप आनन्द और पूर्ण ज्ञान से परिपूर्ण करने को समाधि कहते हैं।

श्रीभोज महाराज समाधि का अर्थ इस प्रकार करते हैं-

सम्यगाधीयत एकाग्रीक्रियते विक्षेपान् परिहृत्य मनो यत्र स समाधि।

जिसमें मन को विक्षेपों से हटाकर यथार्थता से धारण किया जाता है, अर्थात् एकाग्र किया जाता है, वह समाधि है। योगदर्शन के प्रथम पाद में वर्णित सवितर्क समापत्ति को ध्यान की एक अवस्था समझना चाहिए; क्योंकि उसमें शब्द, अर्थ एवं ज्ञान के विकल्प होते हैं और निर्वितर्क समापत्ति को समाधि की अवस्था समझना चाहिए। सप्रज्ञात समाधि की उन्नत अवस्था में ऋतम्भरा प्रज्ञा साधक को भगवप्रसाद के रूप में प्राप्त होती है। इसके बाद समाधि की भी उन्नत श्रेणी है- निर्बीज समाधि। इस स्थिति में संसार के विषय-भोग-वासनाओं के चित्त में संस्कार भी नहीं रहते , ‘संस्कारों’ के बीज-सहित नाश होने पर सब वृत्तियों का पूर्ण निरोध हो जाता है। फिर भव-बन्धन में बाँधने की सम्भावना भी नष्ट हो जाती है, इसे ‘निर्बीज समाधि’ कहते हैं। यह योग की अथवा जीवन की पूर्णता है, जिसे प्राप्त करके महर्षि व्यास के शब्दों में योगी कहता है-

प्राप्तं प्रापणीयं, क्षीणाः क्षेत्तव्याः क्लेशाः, छिन्न श्लिष्टपर्वा भवसंक्रम।

यस्याविच्छेदाज्जनित्वा म्रियते मृत्वा च जायत इति।

ज्ञानस्यैव परा काष्ठा वैराग्यम्। एतस्यैव हि नान्तरीयकं कैवल्यमिति।

(योगसूत्र-व्यासभाष्य-1.16)

ज्ञान की पराकाष्ठा (चरम सीमा) ही वैराग्य है। समाधि द्वारा ज्ञान के इस उच्चतम क्षितिज की प्राप्ति होने पर मोक्ष अवश्यम्भावी है, जिसे पाकर योगी इस प्रकार अनुभव करता है कि प्राप्त करने योग्य सब कुछ पा लिया, क्षीण करने योग्य अविद्यादि क्लेश (अविद्या-अस्मिता-राग-द्वेष-अभिनिवेश) नष्ट हो गये हैं, जिसके पर्व (खण्ड) मिले हुए हैं, ऐसा भव-संक्रमण (एक देह से दूसरे देह की प्राप्ति-रूप संसार का आवागमन) छिन्न-भिन्न हो गये हैं, जिसके छिन्न-भिन्न होने से प्राणी उत्पन्न होकर मरता है और मरकर पुन उत्पन्न होता है।  यहाँ संक्षेप में समाधि का वर्णन किया गया।

जब निरंतर ध्यान के द्वारा हमारा मन और आत्मा मात्र ध्यान में रहे और सारा शरीर शून्य मात्र हो जाए उस स्थिति को समाधि कहते है। इस स्थिति में आत्मा का परमात्मा से मिलन होता है।

समाधि के दो भेद है :- सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात।

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